वक्त था किधर ठहरा
प्यार था इधर गहरा
तेरी यादों में थी मैं लुप्त
लफ्ज़ मेरे ना जाने कहा थे गुप्त
फिर भी क्यों थी ये दूरिया |
रोज़ तेरी बातों को सोचना
उन बातों का मेरे दिल में बसना
तारों को तेरी बातें बताके खुद ही खुद में हस्ना
फिर भी क्यों थी ये दूरिया |
आखों में ये नमी है
महेफिल मे सिर्फ तेरी कमी हैं
कही धूया ही धूया हैं
तो कही सिर्फ बर्फ जमी हैं
फिर भी क्यों थी ये दूरिया |
मोहब्बत के दरिया मे तैरना आसान है
मुश्किल है उससे निकलना
वही इंसान सही हैं
जो समझ जाए सांभलना
शायद इसलिए थी ये दूरिया ||
- By Riddhi Mangla